Wednesday, 27 July 2022

मंहगाई डायन.... खाए जात है!...

 मंहगाई डायन.... खाए जात है!...


भारत देश के अच्छे दिन आ चुके हैं। हमारे देश में हर दिशा में विकास हो रहा है। यह विकास इतना तेज है कि सबका विकास होते हुए भी सबको दिखाई नहीं देता। इस विकास के लिए हमारी सरकारें पूरी तरह से जिम्मेदारी निभाने से पीछे नहीं हट रहीं हैं। इसके लिए हर सरकार के हर मंत्री की खूब पीठ ठोकना तो हमारा कर्तव्य बनता है। इनके जनविकास कार्यों के चलते हमारा सम्मानित रुपया अपने निचले स्तर तक पहुंच करके भी गौरव महसूस कर रहा है।उसने अपने जीवन काल में जिस निचले स्तर को छुआ है उतना तो नेता भी नहीं गिरते होंगे। काले धन को लेकर आने का वायदा किया गया था। इतनै वर्ष गुजर चुके हैं। स्वीस बैंक की लक्ष्मी आई तो नहीं हां हमारे यहां की खून पसीने की कमाई वाली गाढी कमाई उधर जरूर चली गई। यह भी चमत्कार ही था।‌हमारा सफेद धन काला होता चला गया।

हमारी सरकारों ने इतने अच्छे आर्थिक विकास किये कि रिजर्व बैंक की सह में बैंकों ने पूंजीपतियों को इफरात ऋण लेकर, ऋण माफ करके खुद उनके ऋणी होने का सम्मान प्राप्त कर रहे हैं। इसमें हमारी सरकारों के फाइनेंसर पूंजीपतियों के नाम अमीर होते हुए दिवालियापन में सबसे आगे रहे। छोटी बचत करके जो मध्यम वर्ग और नौकरी पेशा वाले बैकों में पैसा जमा करके जमा पूंजी बनाने की सोचते थे उनकी ब्याज दरों में भी खूब कैंची चलाई गई। मतलब यह वर्ग अब मध्यम मारृगी हो गया। न मर सकता है और ना मोटा हो सकता है। सरकारों ने मुफ्त में अनाज बांटकर मुफ्तखोरी का बेहतरीन नमूना पेश किया। सपने देखने कै लिए हो गए।पूरा करने की सोचना भी बेमानी हो गई। आज कल तो भोजन पानी और हवा भी टैक्स के डंडे के साथ जीवन यापन करने को मजबूर हो गए।

एलपीजी, हजार पार तो गाड़ियों का डीजल पेट्रोल सौ पार हो गया। खाने से लेकर पचाने तक सबमें अब रुपया फेंक तमाशा देख वाली स्थिति हो गई। हम जिस सरकारी नौकरी की खुशी जाहिर करके बच्चों को यह बोलते थे कि सरकारी पद के लिए पढ़ो वो भी ठेकेदारी प्रथा की गुलाम हो गई। राजनीति को छोड़कर सब ठेकेदारों के हवाले चला गया। कुछ साल सरकारी गुलामी करो फिर उम्र गुजर जाने के बाद मोहल्ले में सुबह से सोट्टा मारते बैठे रहो। या फिर चाय बेंचो और पकोड़े तलो। इसमें सरकार बिल्कुल निर्दोष है। सरकार का तो यह फर्ज है। सरकार इसी काम के लिए तो बनी है। अपनो पे करम गैरों से भरम वाला गीत यहाँ पर याद आ जाता है।

जब से अग्निवीर योजना चली है तब से वो सेना के अलावा अन्य क्षेत्रों में पहले लागू कर दी गई, इससे बड़ी उसकी सुप्रसिद्धि क्या हो सकती है। कैरियर मेलों में लाखों को रोजगार देने की बात होती, हजारों को मिलता है, और सैकड़े ही नौकरी का मजा लेते हैं। इस तरह के मेलों में उन कंपनियों की जय जयकार होती है जो आमंत्रण में आती है और रबड़ी और मलाई का स्वाद चखती हैं। आज के समय में रसोई जितनी मँहगी हो चुकी है, आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। बहुत पहले एक फिल्म का सुप्रसिद्ध गाना याद आ रहा है। मँहगाई डायन खाये जात है...। हर व्यक्ति इसके लिए सरकार को सम्मानित करना चाहता है। यह सम्मान वो वोट से देना चाहता है।

इस वक्त महगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टा चार पर चर्चा करना भी देश भक्ति का पर्याय बन चुका है, वो देश भक्ति जो देश द्रोह के रूप में सम्मानित होती है। इसके चलते सिर्फ आप कुर्सी का चरण चुम्बन करें तो सरकार और राष्ट्र के वफादार कहलाए जाएँगे। बहरहाल सभी को कोरोनाकाल के बाद हमारे देश के विकास वाले अच्छे और मँहगे दिनों की शुभकामनाएँ।

अनिल अयान, सतना

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