Wednesday, 27 July 2022

मंहगाई डायन.... खाए जात है!...

 मंहगाई डायन.... खाए जात है!...


भारत देश के अच्छे दिन आ चुके हैं। हमारे देश में हर दिशा में विकास हो रहा है। यह विकास इतना तेज है कि सबका विकास होते हुए भी सबको दिखाई नहीं देता। इस विकास के लिए हमारी सरकारें पूरी तरह से जिम्मेदारी निभाने से पीछे नहीं हट रहीं हैं। इसके लिए हर सरकार के हर मंत्री की खूब पीठ ठोकना तो हमारा कर्तव्य बनता है। इनके जनविकास कार्यों के चलते हमारा सम्मानित रुपया अपने निचले स्तर तक पहुंच करके भी गौरव महसूस कर रहा है।उसने अपने जीवन काल में जिस निचले स्तर को छुआ है उतना तो नेता भी नहीं गिरते होंगे। काले धन को लेकर आने का वायदा किया गया था। इतनै वर्ष गुजर चुके हैं। स्वीस बैंक की लक्ष्मी आई तो नहीं हां हमारे यहां की खून पसीने की कमाई वाली गाढी कमाई उधर जरूर चली गई। यह भी चमत्कार ही था।‌हमारा सफेद धन काला होता चला गया।

हमारी सरकारों ने इतने अच्छे आर्थिक विकास किये कि रिजर्व बैंक की सह में बैंकों ने पूंजीपतियों को इफरात ऋण लेकर, ऋण माफ करके खुद उनके ऋणी होने का सम्मान प्राप्त कर रहे हैं। इसमें हमारी सरकारों के फाइनेंसर पूंजीपतियों के नाम अमीर होते हुए दिवालियापन में सबसे आगे रहे। छोटी बचत करके जो मध्यम वर्ग और नौकरी पेशा वाले बैकों में पैसा जमा करके जमा पूंजी बनाने की सोचते थे उनकी ब्याज दरों में भी खूब कैंची चलाई गई। मतलब यह वर्ग अब मध्यम मारृगी हो गया। न मर सकता है और ना मोटा हो सकता है। सरकारों ने मुफ्त में अनाज बांटकर मुफ्तखोरी का बेहतरीन नमूना पेश किया। सपने देखने कै लिए हो गए।पूरा करने की सोचना भी बेमानी हो गई। आज कल तो भोजन पानी और हवा भी टैक्स के डंडे के साथ जीवन यापन करने को मजबूर हो गए।

एलपीजी, हजार पार तो गाड़ियों का डीजल पेट्रोल सौ पार हो गया। खाने से लेकर पचाने तक सबमें अब रुपया फेंक तमाशा देख वाली स्थिति हो गई। हम जिस सरकारी नौकरी की खुशी जाहिर करके बच्चों को यह बोलते थे कि सरकारी पद के लिए पढ़ो वो भी ठेकेदारी प्रथा की गुलाम हो गई। राजनीति को छोड़कर सब ठेकेदारों के हवाले चला गया। कुछ साल सरकारी गुलामी करो फिर उम्र गुजर जाने के बाद मोहल्ले में सुबह से सोट्टा मारते बैठे रहो। या फिर चाय बेंचो और पकोड़े तलो। इसमें सरकार बिल्कुल निर्दोष है। सरकार का तो यह फर्ज है। सरकार इसी काम के लिए तो बनी है। अपनो पे करम गैरों से भरम वाला गीत यहाँ पर याद आ जाता है।

जब से अग्निवीर योजना चली है तब से वो सेना के अलावा अन्य क्षेत्रों में पहले लागू कर दी गई, इससे बड़ी उसकी सुप्रसिद्धि क्या हो सकती है। कैरियर मेलों में लाखों को रोजगार देने की बात होती, हजारों को मिलता है, और सैकड़े ही नौकरी का मजा लेते हैं। इस तरह के मेलों में उन कंपनियों की जय जयकार होती है जो आमंत्रण में आती है और रबड़ी और मलाई का स्वाद चखती हैं। आज के समय में रसोई जितनी मँहगी हो चुकी है, आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। बहुत पहले एक फिल्म का सुप्रसिद्ध गाना याद आ रहा है। मँहगाई डायन खाये जात है...। हर व्यक्ति इसके लिए सरकार को सम्मानित करना चाहता है। यह सम्मान वो वोट से देना चाहता है।

इस वक्त महगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टा चार पर चर्चा करना भी देश भक्ति का पर्याय बन चुका है, वो देश भक्ति जो देश द्रोह के रूप में सम्मानित होती है। इसके चलते सिर्फ आप कुर्सी का चरण चुम्बन करें तो सरकार और राष्ट्र के वफादार कहलाए जाएँगे। बहरहाल सभी को कोरोनाकाल के बाद हमारे देश के विकास वाले अच्छे और मँहगे दिनों की शुभकामनाएँ।

अनिल अयान, सतना

Tuesday, 1 February 2022

कभी तो पधारो म्हारे जेब

 कभी तो पधारो म्हारे जेब


जेबकतरों से सावधान! सुनते सुनते हम असावधान से हो गए। क्योंकि अब जमाना जेबकतरों का नहीं रहा। क्योंकि अब जेब बुशर्ट और पैंट में न रखना ज्यादा फायदे में है। जब जेब नहीं तो रुपये रखने का ऐब नहीं। कुल मिलाकर बंदा बैरागी की तरह रोज कमाओ रोज खाओ। यह मानना है हमारे बजट नियंत्रक श्री श्री एक हजार आठ बजटीलाल दिल्ली वाले। जब से वो बजट की दशा देखें हैं तब से बजट की दिशा में दिशासूल सा हो गया है। बजट हमारे जेब की बजाय थैलियों में अपनी कृपा बरसा रहा है। वैसे भी खाने की रसोई गैस कुछ राहत की साँस ले रही होगी क्योंकि बड़ी मुश्किल से गिरी सम्हली है। इस कोरोना, ओमीक्रान ने बजट को कितना सुंदर बना दिया है। इसका गवाह हमारे गुजरे हुए पिछले दो साल रहे हैं। जिस प्रकार एक परिसर में कई शालाएँ लगाने से मास्टरों की संख्या अतिशेष हो जाती है, उसी तरह यूनियन बजट में रेल,वित्त वगैरह वगैरह मिला देने से संख्या तो बढ़ जाती है, उपयोग कुछ हम हो जाता है।

बजट के पहले बहुत से पूर्वानुमान लगाए जा रहे थे। हमारी जेबें चातक की भाँति बजट प्रस्तुत करने वाली माता जी को निहार रही थी। लेकिन बजट इतने साल से म्हारे जेब तक न पधार सका। हम तो मैया से अपनी अरजी ही लगाते रहे कि मैया कभी तो बजट को म्हारे जेब के आकार का बना दे। पर बजट जेब के साइज का तो न हो सका किन्तु घर के बजट का साइज जरूर बढ़ गया सुरसा के मुख की भाँति। रोजगार बेरोजगार का अनुपात कितना ज्यादा अंतर में है। युवाओं ने अब युवा नौकर बनने की बजाय युवा नेता बनना चयनित कर लिया। रही बात सपनों की तो दिन के काम, और रात के आराम में सपनों पर फिलहाल बजट का कोई कब्जा नहीं हो पाया। क्योंकि सपने फिलहाल इस बजट की पकड़ से बाहर हो चुके हैं। बजट की खासियत यह रही है कि नौकर और बड़ा नौकर बनेगा। मालिक और बड़ा मालिक बनेगा। किसान और बड़ा किसान बनने की रेस में दौड़ता रहेगा। व्यवसायी अब पैसे बैंक में क्यों रखेगा भाई, वो तो बैंक के लोन पर लदकर क्रिप्टो करेंसी में पैसा कमाएगा और सरकार को तीस प्रतिशत टैक्स देगा। बैंक उन्हीं को लोन देकर अपना लोन देने की औपचारिकता पूरा करेंगे ताकि वो भारत छोड़कर स्विस बैंकों में भारत का धन निवेश करें।

बच्चों को पढ़ाना सिर्फ आनलाइन ही रहेगा, आफलाइन भेजता यानि कि कोरोना का कहर बरपेगा। पर डिस्क्लेमर में यह भी है कि बच्चे वैसे पढ़ने के अलावा कुछ भी करें वो कोरोना फ्री रहेगे। जैसे नेता थूक लगाकर चुनाव के पर्चे बाँटने में और बिना मास्क लगाए दूसरों को मास्क लगाने में कोरोना फ्री हो जाते हैं। वैसे भी बजट में गरीबो और अमीरो की सुनवाई होती है, मध्यमवर्गीय लोग मात्र मध्य श्रेणी के हो जाते है, जिसे दोनों तरफ से शोषण झेलना ही है। वैसे बजट की आवक के पहले बाजार की सुख शांति शांतिपूर्ण हो जाती है, शेयर मार्केट धराशायी हो जाते हैं, बजट की महक से बजट पकने तक कम्पनियाँ अपना अपना फायदा देखती है। वैसे इस बार के बजट में तो ऐसी खिचड़ी पकी है कि रेल वाली मूँग और वित्त वाला चावल सबका पित्त बढ़ाने वाला है।मँहगाई वाले दिन अब और अच्छे होते जा रहे हैं। सड़कें तो हैं पर वाहन चलाने के लिए जेबें और छोटी हो गई हैं।उम्मीदें तो हैं पर उम्मीदें अपंग हो गई हैं। नौकरी पेशे वाले को कमाने में, खर्च करने में, खरीदने में, बेंचने में, बचाने में, टैक्स देने की आदत डाल लेनी है। संसद सत्रों में बजट सत्र की अंग्रेजी और अनुवाद वाली हिन्दी उसी तरह समझ के परे है जैसे कि संस्कृत भाषा के विद्वान से अंग्रेजी के अर्थ समझने की कोशिश की जाए। वो तो भला हो अखबारो और चैनलों का जिन्होने इतनी सरल अंग्रेजी और हिन्दी का सारांस आम जनता को उनकी भाषा में समझाने में सफलता प्राप्त की।

वैसे नौकरीपेशे वालों को बजट को अपने अनुरूप मानना भी उसी तरह है जैसे एक बूढा पति यह मान लेता है कि जवान खूबसूरत पत्नी उसी से प्रेम करती है, जिस प्रकार उसके बहुत से प्रेमी हो सकते हैं उसी तरह बजट की प्रेमिकाएँ बहुत सी होती है, जिसके लिए वो समर्पित होता है।बजट जैसा दिखता है वैसा होता नहीं है। जितने रुपयों में शून्यों की संख्या होती है उतनी ही दुविधाएँ भी इसी में छिपी होती हैं। सरकार जिसको घाटे की कंपनी बनाकार उद्योगपतियों को मुनाफा देती है। वो भी इसी बजट के द्वारा ही संतुष्ट की जाती है। एक सुंदर सुशील भारतीय उम्मीदों को पूरा करते बजट के आवक पर सभी को शुभकामनाएँ, इसलिए भी कि अब वो आत्मनिर्भर बनें और मालिक बनकर काम करें। क्योंकि यह ध्यान रखना चाहिये टेलर जितनी बड़ी जेब बजट के लिए बनाएगा, बजट उतना दूर होता जाएगा। बजट ध्रुवतारा है जो देखने में कितना अच्छा लगता है, पर हम पास जाने की नहीं सोच सकते हैं। इसी तरह दर्शन के प्रदर्शन से तृप्त होते रहें। हम तो अपने बजट नियंत्रक बजटीलाल दिल्ली वाले के प्रति आभारी हूँ जो किसी वाद से ग्रसित हुए बिना सलाह देता है, जो मानने योग्य बिल्कुल भी नहीं होती हैं।

अनिल अयान,सतना


Friday, 7 January 2022

परपोषी" "समीक्षक" बनने का सुख

 "परपोषी" "समीक्षक" बनने का सुख

 

- अनिल अयान


जिस प्रकार परपोषी किस्म के जीव खुद को जिंदा रखने के लिए दूसरों को तिल तिल कर मारते हैं तबतक नहीं छोड़ते जब तक की पूरा खून चूस न लें, उसी तरह साहित्य में परपोषी किस्म का एक जीव साहित्य की जमात में पाया जाता है जिसको समीक्षक नाम से जाना जाता है। जिस प्रकार पुलिस विभाग में पुलिस और नगर सेना होती है उसी तरह समीक्षा के विभाग में समालोचक और तथाकथित समीक्षक होते हैं। ये कुनबा साहित्य में परजीवी रूप में सक्रिय रहता है, संपादक लेखक और पाठक के बीच अंतर्संबंध को मजबूत करने की के लिए बतौर स्क्रू होता है, जब मन चाहा टाइट हो गया, जब मन चाहा ढीला हो गया, ये ढीला और टाइट होना भी संपादक और लेखक की मित्रता से तय होता है। पाठक तो वैसे भी एक किनारे ही विराजमान रहता है, वैसे हमारे शहर के वरिष्ठ साहित्यकार चिंतामणि जी ने अपने चिंतन से यह निष्कर्ष निकाला कि कि ये समीक्षक सिर्फ डंडा लिए हवलदारी का रोब ही झाड़ता है, इसके पास ऊपर और नीचे से कुछ भी नहीं होगा। ना ही सही सही लेखक होता है, और ना ही यह सही सही पाठक होता है। तब से मै मान्यवर चिंतामणि जी की चिंतन युक्त बातों के प्रभाव में आकर छिपी चिंता को और समीक्षक होने के सार्वभौमिक सुख को समझने की चेष्ठा कर रहा हूँ। 

हर गाँव, कस्बे, नगर और महानगर में इस तरह के समीक्षक मिल जाएगें। पुस्तकों, पत्रिकाओं, पुस्तिकाओ यहाँ तक की किसी प्रकार की सहमी, कुचली, सार्थक, निरर्थक रचनाओं के बारे में त्वरित टिप्पणी करवाकर लेखक को प्रशंसा का सुख भोगने का अवसर ये समीक्षक तुरंत प्रदान करते हैं। मुफ्त में एक पुस्तक मिल जाती है, हालाँकि इस तरह के समीक्षक पुस्तक के पन्ने पलटना तो दूर पुस्तक को छूना भी पाप समझते हैं, किंतु सबके बीच में स्वनामधन्य सम्मान से जरूर पूज्यनीय होते हैं, क्योंकि तारीफों के पुल बाँधनें  में इनसे बेहतर कोई नहीं होता। ये तो सर्व गुण और सर्व विधा सम्पन्न होते हैं जिनके पास पुस्तक कुछ घंटे के लिये लेखक छोड़ दे तो पुस्तक की समीक्षा में ये समीक्षक पूरी महाभारत लिखने को तैयार बैठे हैं। इन समीक्षकों की संपादकों से अच्छी पहचान होती है, ये लेखक से समीक्षा प्रकाशन का ठेका लेने के लिए हमेशा तैयार होते हैं। इसी ठेके में तो इनका सबसे बड़ा सम्मान और कमाई है। लेखकों को भी बिना मेहनत एक कूडा किताब को प्रचार करने वाला प्रचारक मिल जाता है। इस तरह के समीक्षक वैसे तो शायद ही कलम उठाकर कुछ लिखने की जहमत उठाते होंगे। पर दूसरे के लिखे में जो नहीं लिखा गया उसका जिक्र करने से कभी नहीं चूकते हैं। इनके लिए दिन रात, सुबह शाम, सोते जगते, खाते पीते, उठते बैठते पुस्तकों का पुलिंदा और डिमांड के अनुसार पुरानी समीक्षाओं का संपादन कार्य तैयार रहता है। एक समीक्षा से कई समीक्षाओं को जन्म देने वाले ये समीक्षक साहित्य के सही अर्थों में पोषक होते हैं, ना की शोषक।

समीक्षक एक तरह से साहित्य के नगर सैनिक होते हैं, जो लिफाफा के दर्शन करके अंदर के मजमून बाँच लेते हैं। साहित्यिक संगोष्ठियों में ये ऐसे हावी रहते हैं जैसे कि लेखक से बेहतर यही पुस्तक के बारे में जानते हैं, धीरत गंभीरता तो कभी इनको छू ही नहीं सकती। यदि पाठक इनसे बात करना शुरु कर दे तो ये पाठक को घुड़कियाँ देते हैं कि अभी पुस्तक को एक बार और संजीदगी से पढिए। साथ ही साथ यह स्वीकार भी करते हैं कि हमने पुस्तक एक बार या दो बार नहीं बल्कि कई बार पढी है। मतलब हद है ऐसे परजीवी जो पुस्तक के पन्नों को छूने को पाप समझते हैं वो सरासर सफेद झूठ बोलकर खुद की वाहवाही लूटने में शर्म भी नहीं करते हैं। समीक्षा का कॉलम भी इन लोगों की समीक्षाओं के चलते तथाकथित रूप से प्रचिलित हो जाते हैं। सही मायनों में ये पुस्तक की समालोचना करने की बजाय लेखक की निजता की समालोचना करके उनकी तारीफ करने लग जाते हैं या फिर पुराने बैर साधने लगते हैं। इन समीक्षकों को हिंदी, हिंदी साहित्य और इसके इतिहास से कोई मतलब नहीं है, बस समीक्षक बनने का सुख भोगना है। हमारा साहित्य ऐसे समीक्षकों की वजह से और प्रचुर हो रहा है। क्योंकि गोबर खाद से लेकर यूरिया तक के रूप में ये विद्यमान हैं। समीक्षा के तत्व इनमें हो या ना हो किंतु समाजिक तत्व के रूप में ये जगजाहिर है। कई बार तो लिखने वाले कलमकारों को यहाँ तक कहते हुए भी सुना गया कि " आ गया साहित्य का भाग्य विधाता" इन्हीं के रहमो करम् से तो साहित्य जिंदा है, बाकी सूर,तुलसी,कबीर,रहीम निराला पंत महादेवी तो इन्हीं के पैरों तले साहित्य का ककहरा सीखे होंगे। मतलब इसके बाद अब बेइज्जती भी पानी तो माँगती ही होगी।

लेकिन जिस प्रकार हर क्षेत्र में विदूषकों की जरूरत हमेशा से बनी रही है, उसी तरह इस तरह के परजीवी समीक्षकों की आवश्यकता भी बनी रहेगी। इस तरह के समीक्षक पूर्वकाल के समालोचकों की तुलना में विपरीत होते हैं। पहले किसी भी लेखक को उसकी पुस्तक की समालोचना उसकी इच्छानुसार नहीं उपलब्ध होती थी, बहुत से लेखकों ने समालोचकों से भूमिका लिखवाने और पढने के बाद पुस्तक प्रकाशन का मन होते हुए भी कदम नहीं बढ़ा पाए। पहले के समीक्षक और समालोचक खुद अच्छी रचनाओं के जनक हुआ करते थे और खुद का सृजन भी उनको गौरव की अनुभूति दिलवाता था, परन्तु यहाँ पर तो साहित्य की अंधेर नगरी और अंधेर नगरी के चौपट समीक्षक राज कर रहे हैं। सब लेखक अब इनकी ही जय विजय की कामना करते हैं।आखिकार जब सब जगह अच्छे दिन दिख ही रहे हैं तो इन समीक्षकों से ही तो साहित्य के अच्छे दिन आए हैं।


अनिल अयान,सतना


 


Tuesday, 4 January 2022

देखो ! मामा न बनाना।

 देखो ! मामा न बनाना।


देखो बात बात में मामा न बुलाया करो,,, मामा न बनाया करो, क्योंकि इस समय क्या.. पुराने समय से मामा लोगों ने भानजों का उद्धार नहीं किया। इतिहास गवाह रहा कि, कंश, सकुनि जैसे मामाओं ने कितना भानजों के बारे में सोचा और भाजनों के भविष्य के बारे में कभी सोचा है, तो फिर आज का क्या कहा जाए। हम तो मनाते हैं कि नानी याद दिला दे कोई पर मामा की याद न दिलाए। इस समय भी कुर्सी का लालच ऐसा छाया हुआ है कि कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा मामा बनकर वोट माँगने गली कूचों में चला आता है। क्या उनको इतनी भी शर्म लिहाज नहीं है कि भानजों को अपने घर बुलाकर दान दक्षिणा की व्यवस्था करना चाहिये। परन्तु ये भिखमंगई से मामा लोग कम बाज आएगें पता नहीं। जब भी देखो हाथ जोड़े खड़े हो जाते हैं खीस निपोर कर वोटम दानम करोति। अन्नम दानम करोति.....।आदि आदि।

आज के समय में मामा की इतनी इमेज खराब है कि लोग मामा को मामू समझकर मजाक उड़ाने लगे हैं। अर्थात जिसे यह न कहना हो कि उल्लू न बनाओ, वो सीधे कहते हैं देखो मामू न बनाना। मतलब हद है अब तो रिश्तों की कद्र तक किसी को नहीं रह गई है। ना कोई रिश्ते बनाना चाहता है, और रिश्ते बन भी गए तो निभाना नहीं चाहता। हमारे यहाँ कब कोई मामा जी सुनने को तैयार नहीं है। लोग सोचते हैं मामा जी मतलब बेमतलब की थू थू करवाना। आज कल मामा जी कुछ सुन नहीं रहे, सुन लेते हैं तो समझते नहीं, और समझ भी लिए तो काम का कुछ करते भी नहीं। हमेशा कुछ न कुछ बतंगा खड़ा करते रहते हैं। वर्तमान समय में मामा अपने भानजे भानजियों में जान नहीं छिड़कते बल्कि। जान निकालने का माद्दा रखते हैं। यह तो नजरिये का दोष हैं कि वो भूतकाल के मामा और वर्तमान काल के मामा की नजरों में भेद नहीं कर पाता और मामा जी को अतिथि देवो भवः का रूप मानकर सिर माथे बिठाता है।

इतिहास गवाह रहा है कि मामाओं ने हमेशा भानजों और भानजियों की लुटिया डुबोने का काम किया है। अपने स्वारथ की पूर्ति के लिए भाजनों की जान की बाजी लगाने से भी उन्हें गुरेज नहीं रहा। मामला जब जेब भरने और कैमरे के सामने खुद स्थापित करने का हो तो मामा जी भानजों से दो कदम आगे निकल जाते हैं, फोटो खिंचाने से लेकर टांग अड़ाने में मामा ही मामा नजर आते हैं, मामा लोगों को भाजनों की बेरोजगाई से कोई लेना देना नहीं हैं, मामा लोग भाजनियों की पूजा तो खूब मन से करते हैं किंतु उनकी सलामती के निर्णय लेने में सदियों लगा देते हैं। मामा के रहने से भानजे भानजियाँ इतना प्रसन्न होते हैं कि मामा जी आए, मामा जी आए... लेकिन जब वायदों के सिगूफे के अलावा मामा जी ठेंगा दिखा कर चले जाते हैं तो वही मामा जी फूटी आखिंन नहीं सुहाते हैं। वैसे मामा लोगों के रहने से ननिहाल आबाद रहता है। यह बात अलग है कि मामा ही आजकल मामू बनाने की गति को बढ़ाने में सबसे आगे हैं। इसीलिए योजनाएँ फीकी पड़ी हैं, कुर्सियाँ खाली पड़ी हैं, उम्मीदें जुगाली कर रही हैं और तो और भानजे भानजियाँ अतिथि तुम घर कब जाओगे इस उम्मीद से मामा जी के स्वागत के लिए खड़ी रहती है। 


Saturday, 30 October 2021

फिर कब आएगें नेता जी

 फिर कब आएगें नेता जी


अक्सर इस प्रश्न का उत्तर नेता जी नहीं दे पाते हैं मतदाताओं को, चुनाव में मतदाताओं के द्वार में नतमस्तक होते नेता जी चुनाव के बाद मतदाताओं को अपने द्वार में नतमस्तक होने की ट्रेनिंग देने में निपुण होते हैं, वजह यह है कि वो जानते हैं कि जो राजनीति खेल को खेलते हैं वो रोना रोने का ढ़कोसला करते हैं, और जो चर्चा करते हैं वो चर्चा में अपने आप को व्यस्त कर लेते हैं। वो मतदाता जिसके यहाँ नेता जी का दल भोजन करने गया होता है, वो अपने करम धर के रोता है क्योंकि यह अवसर उसे नंगा करने वाला होता, कंगाली के दरवाजे में लाकर खड़े करने वाला होता है, कभी कभी तो यह कंगाली उसे लंबे समय के लिए साहूकार का कर्जदार बना देती है। इस तरह के जिस मतदाता की चर्चा गाहे बगाहे मन की बात में भी हो जाती है तब तो मानिये कि वो बेचारा इस तरह के कर्ज का आधार बनने के लिए ही आगे का जीवन जीता है।

नेता जी अमूमन जन सभाओं में नारे लगवाने, तालियाँ पिटवाने से लेकर डंका पीटने की लालसा लिये ही गली कूचों में दल के साथ पधारकर बल दिखाते हैं। इस तरह से नेता जी का दौरा भी हो जाता है और खाना पूर्ति भी हो जाती हैं, नेता जी के लिए परिणाम तो संतोष जनक होते हैं किंतु वह क्षेत्र जहाँ दौरा होता है उसके लिए असंतोष ही असंतोष व्याप्त हो जाता है। कभी कभी यह असंतोष तो विघ्न संतोष में भी बदल जाता है॥ मतदाता तो बेचारा राह देखते देखते बियारी से संझवाती भी कर लेता है। इस तरह के दौरों में जब राष्ट्रीय नेता जी या मंत्री जी किसी के घर पधारते हैं तो वो मीडिया में आइकान बन जाता है, मतलब उसको देखकर मीडिया योजनाओं के विकास की कहानी समझ लेते हैं, क्योंकि नेता जी किसी ऐरे गैरे के यहाँ तो जाकर चाय पान और भोजन पानी लेगें नहीं, भाई आम नहीं खासम खास होता है ऐसा मतदाता, अब ऐसे मतदाता के यहाँ यदि उज्ज्वला के बाद भी चूल्हे में रोटियाँ सेकती मिलेंगी। बल्ब का निशुल्क कनेक्शन और निशुल्क गल्ले के बावजूद डिब्बी, मोमबत्ती या एमरजेंसी से उजाला किया जाता दिखेगा। और तो और पार्टी ने उपयोग किये गये बैनर का बिछौना दिखेगा तो, योजनाएँ तो अपना विकास दिखाएगीं ही।

इस तरह के दौरे मतदाता की परीक्षा की घड़ी चुनाव को अपने पक्ष में लाने के लिये किये जाते हैं, किंतु जाने अनजाने नेता जी की परीक्षा और दल बल का परीक्षण खुद बखुद हो जाता है, वाह वाही के चक्कर में वो लोटा डूब जाता है जिसको लेकर नेता जी किसी मतदाता के घर गये थे, जनता समझ जाती है कि यह डूबता हुआ लोटा पखाने वाला है या जल ग्रहण करने वाला है। नेता जी तो इस तरह के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दौरे चलाते ही रहेगें, मतदाता भी इस तरह के दौरों के सुपरिणाम और कुपरिणाम भोगते ही रहेगें। मीडिया भी अपने कैमरे का फोकस इसी तरह नेता जी की तरफ करके आकर्षण का केंद्र बना रहेगा। अब समझना मतदाता को है कि बिना उत्तर पाये वो कब तक और कितने पंचवर्षीय नेता जी को इसी तरह जलपान और भोजन पानी अपने घर में कराकर परोपकार करेगा और परोपकार करके दरिया में डालेगा। साथ ही साथ आगामी पीढ़ी को साहूकार का भुक्तभोगी बनाएगा। क्योंकि नेता जी अबकी बार तुम्हारे घर नहीं तुम्हारे पड़ोसी के यहाँ आएगें जिससे जातिगत पैंतरा फिट करना होगा।


अनिल अयान,सतना


Sunday, 12 September 2021

गोद लिये गाँव गोदी में ही रहे

 गोद लिये गाँव गोदी में ही रहे

अनिल अयान


अधिक्तर सुनता हूँ कि किसी मंत्री, किसी सांसद, किसी विधायक ने गाँव गोद लिये हैं, एक बढ़िया सी प्रेस कांफ्रेंस और समाचार पत्रों में समाचार में सब बोल्ड अक्षरों में प्रकाशित हो जाते हैं, पर सही मायनों में ये गाँव क्रिकेट के बोल्ड की तरह आउट तो नहीं हो जाते हैं। शायद इन गाँवों का नाम दर्ज इसलिए दर्ज होता है कि उन राजनेताओं के खाते में गांव सेवा का खाता भर दिया जाए, पर शायद ही उन गाँवो के खाते  इनके द्वारा भरे जाते होंगे। इन गाँवों के काम तो अनाथ गाँवों की तरह सरपंच और पंचायत सचिव की कलम के नीचे दबे होते हैं, इसलिए अधूरे ही रह जाते हैं, अब यह न कहूँगा कि कमीशन खोरी की बीमारी यहाँ नहीं होती, इसका डाक्टर नहीं मिलता इलाज के लिए। इन गाँवों में सड़क में नाली संड़ास मारती है, बैंको की लाइनों से बड़ी लाइने राशन की दुकान में होती है, हर मौसम की अपनी रौबदारी होती हैं, गर्मी में पानी नहीं, बारिस में पानी ही पानी, ठंडी में ओला पाला आदि आदि न जाने कितनी ही मुसीबते इन गाँवों में व्याप्त रहती हैं। हमारे राजनेता जो गोद लेकर इन गाँवों के पितामह बन जाते हैं, या यह कहें माईबाप बन जाते हैं वो इनके आस पास झाँकने भी नहीं जाते, इन गाँवों को सरकारी आंकड़ों में विशेष दर्जा प्राप्त हो जाता है परन्तु ये आंकड़ा विहीन हो जाते हैं।

सरकारी योजनाएँ इन गाँवों के पंचायत भवन में ही रह जाती हैं, नरेगा और मनरेगा में काम किसी, पासबुक किसी का, खाते से रकम किसी का हाल चलता है, यहाँ विद्यालयों में बच्चे कम और गंजेड़ी और शराबियों का डेरा रहता है, निर्मल ग्राम की संज्ञा सर्वनाम में बदल तो जाती है पर विशेषण नहीं बन पाती। राजनेतागण राजकाज में व्यस्त इतने हो जाते हैं कि ये गोदी में लिए गाँव गोद से उतरकर चल ही नहीं पाते, यदि चलने की कोशिश करते हैं, यहाँ के पटवारी और बैंक के लोन वाले पीछा नहीं छोड़ते। इन गाँवों में आवागमन के साधनों की कमी हमेशा बनी रहती है। इन गाँवों में से शायद ही विकास की कोई आवाज उठती हो। परन्तु पार्टियों के कार्यालयों में इन गोद लिये गावों का ऐसा गुणगान किया जाता है कि लगता है जैसे सबसे समृद्धशाली गाँव ये ही हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं ऐसे गोद लिये हुए गाँव कई पंचवर्षीय तक नाबालिक ही बने रहते हैं क्योंकि बालिग बनाने वाले धतकरम करने के लिए माई बाप बने नेताओं के चक्कर और उनके दलालों की दलाली करने में इनके सरपंच और पंचायत सचिव हार मान लेते हैं।

बहरहाल मै तो रास्ते में पड़ने वाले तीन गावों के उस होर्डिंग को देखकर प्रार्थना करता हूँ जिसे जिले के सांसद, क्षेत्र के विधायक और अमुक नेता जी ने गोद लिया था। और तो और वायदा किया था कि आगे आने वाले पाँच सालों में ये गाँव साफ सुथरे नजर आएगें। एक वो दिन था और हर दिन की वो सुबह होती है जब इन गाँवों से लगी सड़कों से गुजरता हूँ और नित्यक्रिया में नित्य लगे ग्रामवासी आते जाते नजर आते हैं।  इन गावों की गिनती गिन रहा था तो पता चला कि इस तरह के गाँव इकाई से दहाई और दहाई से सैकड़ा तक पहुँच चुके हैं, लेकिन ये गाँव बालिग नहीं हो पाए, नेता जी इन गाँवों में गिनती से दस दिन भी साल भर में पहुँचते हों, मै तो वो अलादीन का चिराग ढूँढ़ रहा हूँ कि बस घिसा और जिंद प्रकट हो गया, और इन गाँवों को स्मार्टनेस बना दे। जो इन गाँवों की मलिन बस्तियाँ चकाचक कर दे। रोड़ों के खड़जे मजबूत कर दे और तो और पालक बने नेता जी यदि नियमित आने लगें ये गोद लिये गाँव उनके लिए कितने दुआएँ दें ताकि वो बार बार राजनीति में चमत्कार करते रहें। ये गाँव भी गोद से उतरकर अपनी दौड़ में दौड़ने लगें।

अनिल अयान 

सतना

Saturday, 4 September 2021

टीचर बना फटीचर

व्यंग्य- टीचर बना फटीचर

एक जमाना था जब गुरुजी, आचार्य जी और शिक्षकों का समाज में बहुत सम्मान हुआ करता था, आज के समय पर यदि अपमान ना हो तो वही शिक्षक के लिए सबसे बड़ा सम्मान है। आजकल के शिक्षक यानी की पढ़ें लिखे गुलाम, एजूकेशनल स्लेव, जिनके पास कहने को डिग्रियों की लंबी पूंछ है पर कोई पूछ परख नहीं है। सरकार शिक्षक बनने नहीं दे रही, और शिक्षा महाविद्यालयों में सामान्य नागरिक को शिक्षा देने की ट्रेनिंग पे ट्रेनिंग दिए ही जा रही है। ऐसा लगता है कि फौजी तैयार है पर युद्ध में सरकार की अनुमति नहीं है। हमारी सरकार ने तो वैसे भी शिक्षकों को फटीचर बना दिया है। शिक्षक दिवस जैसे पहले हुआ करते थे अव वैसे नहीं रहे, शिक्षक, शिक्षक ही नहीं रहा तो शिक्षक दिवस कैसा गुरू।
गुरू का उपयोग चालाक मानव के लिए होने लगा। मास्टर साहब को मास्टरमाइंड में बदल दिया गया, अपराध जगत का सबसे बड़ा तमगा यही है, सरकारों ने अध्यापक को शिक्षाकर्मियों, संविदा शिक्षकों और शिक्षामित्रों और भी ना जाने किस नाम से पुकारने लगी। यहां नेताओं को पेंशन मिल जाती है शिक्षकों को भूंजी भांग भी नसीब नहीं। शिक्षकों की स्थिति पे शिक्षक ही शर्मिंदा हो गया। सबके लिए योजनाएं हैं शिक्षकों के लिए कोई योजना नहीं है। जिला शिक्षा अधिकारी सरकारी स्कूलों के लिए उत्तरदाई है, प्राइवेट स्कूलों में टीचर्स को ऐसे पाला जा रहा है कि ना वो मरे न मोटाए। प्राइवेट शिक्षक से बेहतर तो काम वाली बाई और स्वीपर है जिसका पैसा अगर कट जाए तो दस गालियां देकर काम छोड़ दें। यहां तो शिक्षकों का काट कर वेतन मिलता है। उसमें में छुट्टी अगर लिए तो लग गई लीव विदाउट पे।
सरकार ने वैसे भी कोचिंग सेंटरों की खटिया खड़ी कर रखी है। पिछले कोरोना काल से शिक्षक बने कोचिंग टीचर्स कहीं पानी मांगने लायक नहीं बचे, आनलाइन क्लास तो शिक्षकों को सर्कस का शेर बना दिया है। इससे घोर बेइज्जती शिक्षकों की कभी नहीं देखा मैंने, सारे बच्चे और पैरेंट्स शिक्षकों को लुल्ल समझ कर रखे हुए हैं, और खुद को ज्ञान से फुल बने बैठे हैं। शिक्षक के लिए ये आनलाइन क्लास सबसे बड़ी यानि की कालापानी की सजा है। शिक्षक इससे ज्यादा बेइज्जत कभी न महसूस किया होगा। सरकार और कई स्कूल तो क्लास में भी पढ़वाते है और आनलाइन भी मतलब शिक्षक को पूरी तरह से तवायफ बना दिए, आनलाइन भी मनोरंजन और आफलाइन भी मनोरंजन करो। नहीं तो धमकी वेतन न मिलेगा वो भी आधा वाला वेतन। मैंने ऐसे बहुत से शिक्षक देखें जिनको घर में बिठा दिया गया क्योंकि वो आनलाइन में बच्चों का मनोरंजन नहीं कर पा रहे थे पर क्लास में वो बहुत अच्छे शिक्षक थे। यह दुर्दशा नहीं तो क्या सम्मान है।
बच्चों को ज्ञान मिल रहा, स्कूल को फीस मिल रही है आधी अधूरी या अंत तक पूरी, पैरेंट्स को बच्चे किताबों से घिरे मिल रहे हैं पर शिक्षकों को क्या मिल रहा है। आदर्शवादी व्यवस्था में शहादत। आधा वेतन दोगुना काम, ना वेतन वृद्धि, ना छुट्टी, काटा गया वेतन भी मिलने की उम्मीद जो कभी पूरी नहीं होती। बहुत से शिक्षक ऐसे हैं जिन्होने समय रहते आपदा में अवसर तलाश कर लिया, कोई बिजनेस करने लगा, कोई स्टार्ट अप शुरू कर दिया, किसी ने कोई न कोई काम करना शुरू कर दिया।
इन सबके बीच शिक्षकों ने दिखा दिया कि वो भूतपूर्व शिक्षक तो हैं साथ ही साथ अभूतपूर्व व्यक्ति भी है। शिक्षक दिवस की उन अभूतपूर्व व्यक्तित्वों को भी नमन करता हूं। आपने हर व्यक्ति कामगार व्यवसायियों का संगठन देखा होगा। यहां तक कि विद्यालयों का भी संगठन बने हैं, जिसको जब देखो धरना प्रदर्शन और हड़ताल करते रहते हैं। शिक्षक इतना संभ्रांत किस्म का व्यक्ति हैं कि वो कभी संगठन में नहीं जुड़ा, सरकारी शिक्षक हो सकता है कि जुड़े ही हों। सामान्य शिक्षक संघर्ष कर सकता है भूखों मर सकता है पर अपनी इमेज हड़ताल और धरना करके खराब नहीं कर सकता है। ऐसे दृढ़ संकल्प लिये शिक्षक सम्मान के पात्र हैं।
जब डा राधाकृष्णन जी ने  शिक्षक समुदाय को देखा और उनको सम्मान दिया तब शिक्षक की दशा और आज के समय में शिक्षक की दुर्दशा के बीच का अंतर सभी को साफ दिखता है। शिक्षकों का कोई माई-बाप नहीं है, जो माई-बाप बने बैठे हैं वो बगलें झांक रहे हैं, सफाई देते फिर रहे हैं। मैं ऐसे विद्यालयों से भी परिचित हूं जहां शिक्षकों को प्रिंसिपल आफिस में अपमान ही मिलता है। विद्यालय अभिभावकों की सुनते हैं और शिक्षकों की भगवान भी नहीं सुनता। बहुत से अच्छे शिक्षक विद्यालय और पैरेंट्स की जिद की वजह से निकाल दिए जाते हैं। आप खुद सोचिए कि यदि यह काम इतना अच्छा है तो सरकार को समाज में इफरात शिक्षक देना चाहिए। उन्हें पेंशन और अच्छा वेतन देना चाहिए उनकी समस्याओं की सुनवाई होना चाहिए।  यदि यह काम  अच्छा नहीं है सरकार को स्कूल बंद करके टीचिंग ऐप्स से बच्चों को शिक्षा देना चाहिए। पर आज शिक्षा बांटने शिक्षक वाला खुद अपनी बुनियादी मांग पूरा करने के लिए संघर्षरत और मांगने वालों की कतार में खड़ा है
शिक्षको के लिए आदर्शवादी बातें बहुत की जाती है पर उसके भविष्य के प्रति बात होने पर संस्थाओं के मुंह में दही जम जाता है।
शिक्षक दिवस में सभी शिक्षक याद किये जा सकते हैं चाहे वो गुरुकुल के हों, चाहें विद्यालय के हों, चाहें महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के हों,पर एक विभाजन रेखा है सरकारी और निजी क्षेत्र जिसके चलते शिक्षक समुदाय का भी विभाजन हो जाता है। जैसे बीपीएल गरीबी रेखा के नीचे और एपीएल ग़रीबी रेखा के ऊपर।  यह दिवस डा राधाकृष्णन जी का जन्मदिन हो सकता है पर शिक्षक दिवस नहीं हो सकता है। आज हजारों स्कूल बंद हो गए, बच्चों की पढ़ाई बंद हो गई, शिक्षक समाप्त हो गए। इस सबके बीच शिक्षकों दिवस में हैप्पी टीचर्स डे बोलना इस शिक्षण सेवा का घोर अपमान नहीं तो और क्या है। इन परिस्थितियों के बीच में जो शिक्षक डार्विन के विकासवाद को अपनाने का जोखिम उठा रहे हैं वो बधाई के पात्र हैं। वो शिक्षक भी बधाई के पात्र हैं जिनके लिए शिक्षक दिवस मात्र तारीख है, तारीफ नहीं। जिनके विद्यालय में यह दिन मनाया ही नहीं जाता।।। कुल मिलाकर कर टीचर से फटीचर बने जीवधारियों को और पढ़ें लिखे गुलामों को उन्हीं के जैसे एक गुलाम की तरह से हैप्पी टीचर्स डे।

अनिल अयान
सतना मध्य प्रदेश
संपर्क-9479411407

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