गोद लिये गाँव गोदी में ही रहे
अनिल अयान
अधिक्तर सुनता हूँ कि किसी मंत्री, किसी सांसद, किसी विधायक ने गाँव गोद लिये हैं, एक बढ़िया सी प्रेस कांफ्रेंस और समाचार पत्रों में समाचार में सब बोल्ड अक्षरों में प्रकाशित हो जाते हैं, पर सही मायनों में ये गाँव क्रिकेट के बोल्ड की तरह आउट तो नहीं हो जाते हैं। शायद इन गाँवों का नाम दर्ज इसलिए दर्ज होता है कि उन राजनेताओं के खाते में गांव सेवा का खाता भर दिया जाए, पर शायद ही उन गाँवो के खाते इनके द्वारा भरे जाते होंगे। इन गाँवों के काम तो अनाथ गाँवों की तरह सरपंच और पंचायत सचिव की कलम के नीचे दबे होते हैं, इसलिए अधूरे ही रह जाते हैं, अब यह न कहूँगा कि कमीशन खोरी की बीमारी यहाँ नहीं होती, इसका डाक्टर नहीं मिलता इलाज के लिए। इन गाँवों में सड़क में नाली संड़ास मारती है, बैंको की लाइनों से बड़ी लाइने राशन की दुकान में होती है, हर मौसम की अपनी रौबदारी होती हैं, गर्मी में पानी नहीं, बारिस में पानी ही पानी, ठंडी में ओला पाला आदि आदि न जाने कितनी ही मुसीबते इन गाँवों में व्याप्त रहती हैं। हमारे राजनेता जो गोद लेकर इन गाँवों के पितामह बन जाते हैं, या यह कहें माईबाप बन जाते हैं वो इनके आस पास झाँकने भी नहीं जाते, इन गाँवों को सरकारी आंकड़ों में विशेष दर्जा प्राप्त हो जाता है परन्तु ये आंकड़ा विहीन हो जाते हैं।
सरकारी योजनाएँ इन गाँवों के पंचायत भवन में ही रह जाती हैं, नरेगा और मनरेगा में काम किसी, पासबुक किसी का, खाते से रकम किसी का हाल चलता है, यहाँ विद्यालयों में बच्चे कम और गंजेड़ी और शराबियों का डेरा रहता है, निर्मल ग्राम की संज्ञा सर्वनाम में बदल तो जाती है पर विशेषण नहीं बन पाती। राजनेतागण राजकाज में व्यस्त इतने हो जाते हैं कि ये गोदी में लिए गाँव गोद से उतरकर चल ही नहीं पाते, यदि चलने की कोशिश करते हैं, यहाँ के पटवारी और बैंक के लोन वाले पीछा नहीं छोड़ते। इन गाँवों में आवागमन के साधनों की कमी हमेशा बनी रहती है। इन गाँवों में से शायद ही विकास की कोई आवाज उठती हो। परन्तु पार्टियों के कार्यालयों में इन गोद लिये गावों का ऐसा गुणगान किया जाता है कि लगता है जैसे सबसे समृद्धशाली गाँव ये ही हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं ऐसे गोद लिये हुए गाँव कई पंचवर्षीय तक नाबालिक ही बने रहते हैं क्योंकि बालिग बनाने वाले धतकरम करने के लिए माई बाप बने नेताओं के चक्कर और उनके दलालों की दलाली करने में इनके सरपंच और पंचायत सचिव हार मान लेते हैं।
बहरहाल मै तो रास्ते में पड़ने वाले तीन गावों के उस होर्डिंग को देखकर प्रार्थना करता हूँ जिसे जिले के सांसद, क्षेत्र के विधायक और अमुक नेता जी ने गोद लिया था। और तो और वायदा किया था कि आगे आने वाले पाँच सालों में ये गाँव साफ सुथरे नजर आएगें। एक वो दिन था और हर दिन की वो सुबह होती है जब इन गाँवों से लगी सड़कों से गुजरता हूँ और नित्यक्रिया में नित्य लगे ग्रामवासी आते जाते नजर आते हैं। इन गावों की गिनती गिन रहा था तो पता चला कि इस तरह के गाँव इकाई से दहाई और दहाई से सैकड़ा तक पहुँच चुके हैं, लेकिन ये गाँव बालिग नहीं हो पाए, नेता जी इन गाँवों में गिनती से दस दिन भी साल भर में पहुँचते हों, मै तो वो अलादीन का चिराग ढूँढ़ रहा हूँ कि बस घिसा और जिंद प्रकट हो गया, और इन गाँवों को स्मार्टनेस बना दे। जो इन गाँवों की मलिन बस्तियाँ चकाचक कर दे। रोड़ों के खड़जे मजबूत कर दे और तो और पालक बने नेता जी यदि नियमित आने लगें ये गोद लिये गाँव उनके लिए कितने दुआएँ दें ताकि वो बार बार राजनीति में चमत्कार करते रहें। ये गाँव भी गोद से उतरकर अपनी दौड़ में दौड़ने लगें।
अनिल अयान
सतना
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