Friday, 7 January 2022

परपोषी" "समीक्षक" बनने का सुख

 "परपोषी" "समीक्षक" बनने का सुख

 

- अनिल अयान


जिस प्रकार परपोषी किस्म के जीव खुद को जिंदा रखने के लिए दूसरों को तिल तिल कर मारते हैं तबतक नहीं छोड़ते जब तक की पूरा खून चूस न लें, उसी तरह साहित्य में परपोषी किस्म का एक जीव साहित्य की जमात में पाया जाता है जिसको समीक्षक नाम से जाना जाता है। जिस प्रकार पुलिस विभाग में पुलिस और नगर सेना होती है उसी तरह समीक्षा के विभाग में समालोचक और तथाकथित समीक्षक होते हैं। ये कुनबा साहित्य में परजीवी रूप में सक्रिय रहता है, संपादक लेखक और पाठक के बीच अंतर्संबंध को मजबूत करने की के लिए बतौर स्क्रू होता है, जब मन चाहा टाइट हो गया, जब मन चाहा ढीला हो गया, ये ढीला और टाइट होना भी संपादक और लेखक की मित्रता से तय होता है। पाठक तो वैसे भी एक किनारे ही विराजमान रहता है, वैसे हमारे शहर के वरिष्ठ साहित्यकार चिंतामणि जी ने अपने चिंतन से यह निष्कर्ष निकाला कि कि ये समीक्षक सिर्फ डंडा लिए हवलदारी का रोब ही झाड़ता है, इसके पास ऊपर और नीचे से कुछ भी नहीं होगा। ना ही सही सही लेखक होता है, और ना ही यह सही सही पाठक होता है। तब से मै मान्यवर चिंतामणि जी की चिंतन युक्त बातों के प्रभाव में आकर छिपी चिंता को और समीक्षक होने के सार्वभौमिक सुख को समझने की चेष्ठा कर रहा हूँ। 

हर गाँव, कस्बे, नगर और महानगर में इस तरह के समीक्षक मिल जाएगें। पुस्तकों, पत्रिकाओं, पुस्तिकाओ यहाँ तक की किसी प्रकार की सहमी, कुचली, सार्थक, निरर्थक रचनाओं के बारे में त्वरित टिप्पणी करवाकर लेखक को प्रशंसा का सुख भोगने का अवसर ये समीक्षक तुरंत प्रदान करते हैं। मुफ्त में एक पुस्तक मिल जाती है, हालाँकि इस तरह के समीक्षक पुस्तक के पन्ने पलटना तो दूर पुस्तक को छूना भी पाप समझते हैं, किंतु सबके बीच में स्वनामधन्य सम्मान से जरूर पूज्यनीय होते हैं, क्योंकि तारीफों के पुल बाँधनें  में इनसे बेहतर कोई नहीं होता। ये तो सर्व गुण और सर्व विधा सम्पन्न होते हैं जिनके पास पुस्तक कुछ घंटे के लिये लेखक छोड़ दे तो पुस्तक की समीक्षा में ये समीक्षक पूरी महाभारत लिखने को तैयार बैठे हैं। इन समीक्षकों की संपादकों से अच्छी पहचान होती है, ये लेखक से समीक्षा प्रकाशन का ठेका लेने के लिए हमेशा तैयार होते हैं। इसी ठेके में तो इनका सबसे बड़ा सम्मान और कमाई है। लेखकों को भी बिना मेहनत एक कूडा किताब को प्रचार करने वाला प्रचारक मिल जाता है। इस तरह के समीक्षक वैसे तो शायद ही कलम उठाकर कुछ लिखने की जहमत उठाते होंगे। पर दूसरे के लिखे में जो नहीं लिखा गया उसका जिक्र करने से कभी नहीं चूकते हैं। इनके लिए दिन रात, सुबह शाम, सोते जगते, खाते पीते, उठते बैठते पुस्तकों का पुलिंदा और डिमांड के अनुसार पुरानी समीक्षाओं का संपादन कार्य तैयार रहता है। एक समीक्षा से कई समीक्षाओं को जन्म देने वाले ये समीक्षक साहित्य के सही अर्थों में पोषक होते हैं, ना की शोषक।

समीक्षक एक तरह से साहित्य के नगर सैनिक होते हैं, जो लिफाफा के दर्शन करके अंदर के मजमून बाँच लेते हैं। साहित्यिक संगोष्ठियों में ये ऐसे हावी रहते हैं जैसे कि लेखक से बेहतर यही पुस्तक के बारे में जानते हैं, धीरत गंभीरता तो कभी इनको छू ही नहीं सकती। यदि पाठक इनसे बात करना शुरु कर दे तो ये पाठक को घुड़कियाँ देते हैं कि अभी पुस्तक को एक बार और संजीदगी से पढिए। साथ ही साथ यह स्वीकार भी करते हैं कि हमने पुस्तक एक बार या दो बार नहीं बल्कि कई बार पढी है। मतलब हद है ऐसे परजीवी जो पुस्तक के पन्नों को छूने को पाप समझते हैं वो सरासर सफेद झूठ बोलकर खुद की वाहवाही लूटने में शर्म भी नहीं करते हैं। समीक्षा का कॉलम भी इन लोगों की समीक्षाओं के चलते तथाकथित रूप से प्रचिलित हो जाते हैं। सही मायनों में ये पुस्तक की समालोचना करने की बजाय लेखक की निजता की समालोचना करके उनकी तारीफ करने लग जाते हैं या फिर पुराने बैर साधने लगते हैं। इन समीक्षकों को हिंदी, हिंदी साहित्य और इसके इतिहास से कोई मतलब नहीं है, बस समीक्षक बनने का सुख भोगना है। हमारा साहित्य ऐसे समीक्षकों की वजह से और प्रचुर हो रहा है। क्योंकि गोबर खाद से लेकर यूरिया तक के रूप में ये विद्यमान हैं। समीक्षा के तत्व इनमें हो या ना हो किंतु समाजिक तत्व के रूप में ये जगजाहिर है। कई बार तो लिखने वाले कलमकारों को यहाँ तक कहते हुए भी सुना गया कि " आ गया साहित्य का भाग्य विधाता" इन्हीं के रहमो करम् से तो साहित्य जिंदा है, बाकी सूर,तुलसी,कबीर,रहीम निराला पंत महादेवी तो इन्हीं के पैरों तले साहित्य का ककहरा सीखे होंगे। मतलब इसके बाद अब बेइज्जती भी पानी तो माँगती ही होगी।

लेकिन जिस प्रकार हर क्षेत्र में विदूषकों की जरूरत हमेशा से बनी रही है, उसी तरह इस तरह के परजीवी समीक्षकों की आवश्यकता भी बनी रहेगी। इस तरह के समीक्षक पूर्वकाल के समालोचकों की तुलना में विपरीत होते हैं। पहले किसी भी लेखक को उसकी पुस्तक की समालोचना उसकी इच्छानुसार नहीं उपलब्ध होती थी, बहुत से लेखकों ने समालोचकों से भूमिका लिखवाने और पढने के बाद पुस्तक प्रकाशन का मन होते हुए भी कदम नहीं बढ़ा पाए। पहले के समीक्षक और समालोचक खुद अच्छी रचनाओं के जनक हुआ करते थे और खुद का सृजन भी उनको गौरव की अनुभूति दिलवाता था, परन्तु यहाँ पर तो साहित्य की अंधेर नगरी और अंधेर नगरी के चौपट समीक्षक राज कर रहे हैं। सब लेखक अब इनकी ही जय विजय की कामना करते हैं।आखिकार जब सब जगह अच्छे दिन दिख ही रहे हैं तो इन समीक्षकों से ही तो साहित्य के अच्छे दिन आए हैं।


अनिल अयान,सतना


 


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