फिर कब आएगें नेता जी
अक्सर इस प्रश्न का उत्तर नेता जी नहीं दे पाते हैं मतदाताओं को, चुनाव में मतदाताओं के द्वार में नतमस्तक होते नेता जी चुनाव के बाद मतदाताओं को अपने द्वार में नतमस्तक होने की ट्रेनिंग देने में निपुण होते हैं, वजह यह है कि वो जानते हैं कि जो राजनीति खेल को खेलते हैं वो रोना रोने का ढ़कोसला करते हैं, और जो चर्चा करते हैं वो चर्चा में अपने आप को व्यस्त कर लेते हैं। वो मतदाता जिसके यहाँ नेता जी का दल भोजन करने गया होता है, वो अपने करम धर के रोता है क्योंकि यह अवसर उसे नंगा करने वाला होता, कंगाली के दरवाजे में लाकर खड़े करने वाला होता है, कभी कभी तो यह कंगाली उसे लंबे समय के लिए साहूकार का कर्जदार बना देती है। इस तरह के जिस मतदाता की चर्चा गाहे बगाहे मन की बात में भी हो जाती है तब तो मानिये कि वो बेचारा इस तरह के कर्ज का आधार बनने के लिए ही आगे का जीवन जीता है।
नेता जी अमूमन जन सभाओं में नारे लगवाने, तालियाँ पिटवाने से लेकर डंका पीटने की लालसा लिये ही गली कूचों में दल के साथ पधारकर बल दिखाते हैं। इस तरह से नेता जी का दौरा भी हो जाता है और खाना पूर्ति भी हो जाती हैं, नेता जी के लिए परिणाम तो संतोष जनक होते हैं किंतु वह क्षेत्र जहाँ दौरा होता है उसके लिए असंतोष ही असंतोष व्याप्त हो जाता है। कभी कभी यह असंतोष तो विघ्न संतोष में भी बदल जाता है॥ मतदाता तो बेचारा राह देखते देखते बियारी से संझवाती भी कर लेता है। इस तरह के दौरों में जब राष्ट्रीय नेता जी या मंत्री जी किसी के घर पधारते हैं तो वो मीडिया में आइकान बन जाता है, मतलब उसको देखकर मीडिया योजनाओं के विकास की कहानी समझ लेते हैं, क्योंकि नेता जी किसी ऐरे गैरे के यहाँ तो जाकर चाय पान और भोजन पानी लेगें नहीं, भाई आम नहीं खासम खास होता है ऐसा मतदाता, अब ऐसे मतदाता के यहाँ यदि उज्ज्वला के बाद भी चूल्हे में रोटियाँ सेकती मिलेंगी। बल्ब का निशुल्क कनेक्शन और निशुल्क गल्ले के बावजूद डिब्बी, मोमबत्ती या एमरजेंसी से उजाला किया जाता दिखेगा। और तो और पार्टी ने उपयोग किये गये बैनर का बिछौना दिखेगा तो, योजनाएँ तो अपना विकास दिखाएगीं ही।
इस तरह के दौरे मतदाता की परीक्षा की घड़ी चुनाव को अपने पक्ष में लाने के लिये किये जाते हैं, किंतु जाने अनजाने नेता जी की परीक्षा और दल बल का परीक्षण खुद बखुद हो जाता है, वाह वाही के चक्कर में वो लोटा डूब जाता है जिसको लेकर नेता जी किसी मतदाता के घर गये थे, जनता समझ जाती है कि यह डूबता हुआ लोटा पखाने वाला है या जल ग्रहण करने वाला है। नेता जी तो इस तरह के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दौरे चलाते ही रहेगें, मतदाता भी इस तरह के दौरों के सुपरिणाम और कुपरिणाम भोगते ही रहेगें। मीडिया भी अपने कैमरे का फोकस इसी तरह नेता जी की तरफ करके आकर्षण का केंद्र बना रहेगा। अब समझना मतदाता को है कि बिना उत्तर पाये वो कब तक और कितने पंचवर्षीय नेता जी को इसी तरह जलपान और भोजन पानी अपने घर में कराकर परोपकार करेगा और परोपकार करके दरिया में डालेगा। साथ ही साथ आगामी पीढ़ी को साहूकार का भुक्तभोगी बनाएगा। क्योंकि नेता जी अबकी बार तुम्हारे घर नहीं तुम्हारे पड़ोसी के यहाँ आएगें जिससे जातिगत पैंतरा फिट करना होगा।
अनिल अयान,सतना